
बिहार का मिथिलांचल का प्रदेश ! और वहाँ का जाना माना दरभंगा जिला जहाँ किसी दौर में राजा भी थे और रानी भी थी ! दरभंगा आज़ादी से पहले एक रियासत थी जिसका अपना इतिहास भी था और अपनी धरोहरें भी थीं । उसी दरभंगा जिले की अंतिम रानी थी कामसुंदरी देवी जी ! नाम से बिल्कुल विपरीत ! सौम्य ! उदारवादी ! परमार्थ में विश्वास रखनें वाली ! मानवतावादी ! महारानी जी के नाम में तो काम था किंतु रूप में नही ! वहाँ तो भव्यता थी ! मन को बाँध लेने वाली स्निग्धता थी ! आत्मा के रेशे-रेशे में उतर जानें वाली सुंदरता थी ! मिथिला में उनके प्राण बसते थे ! मिथिला की भलाई उनका जीवन ध्येय था ! बिना जताए , बिना बताए मिथिला के लिए जनकल्याण करना उनकी दैनिक दिनचर्या का एक अहम हिस्सा था। दरभंगा के अंतिम महाराजा की वो तीसरी पत्नी थी और अपने पति की तीसरी पत्नी होनें की स्थिति का उन्होनें बड़ी गरिमा से निर्वाहन किया । वो राजसी थीं ! उनके पास यौवन था ! रूप था ! धन-धान्य था ! मोती- माणिक ! हीरे जवाहरात , स्वर्णाभूषण , मान-सम्मान आदि सब उपलब्ध थे ! किंतु महारानी के हृदय का एक गहनतम कोना बैरागी सा था । सांसारिक सुख साधन की समस्त सामग्री भी उनके मन के उस कोने के वैराग्य को न दूर कर पाई थी !
1962 का वर्ष चल रहा था ! भारत की उत्तरी पूर्वी सीमाओं पर परिस्थितियाँ जटिल होती जा रहीं थीं ! चीन की तरफ से भारतीय सीमाओं पर सैन्य गतिविधियाँ तीव्र हो गई थी । चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण आम सी बात हो गई थी । तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल नें प्रधानमंत्री नेहरू को चेताया कि चीन के खतरनाक मंसूबों से सावधान रहें किंतु नेहरू जी को चीन के साथ हुए पंचशील समझौते पर अटूट विश्वास था ! जहाँ विश्वास अटूट होता है वहाँ विश्वासघात भी भयावह होता है । भारत के साथ भी भयावह विश्वासघात हुआ ! 20 अक्टूबर 1962 की रात चीन ने धोखे से भारत पर आक्रमण कर दिया ! ये आक्रमण दोतरफा था – लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर ! सबसे भयावह स्थिति लद्दाख की बर्फीली सरहदों की थीं ! भारतीय सैनाओं को अकस्मात ही आदेश दिए गए कि वो बर्फ से लदी हिमालय की चोटियों की ओर कूच करें और आधुनिक शस्त्र बल से सुसज्जित तथा हर तरह से मुस्तैद चीनी सैना से युद्ध करें । अक्टूबर का महीना ! लद्दाख का माइनस बीस से भी कम डिग्री का तापमान ! बर्फीले तूफान ! और सबसे बड़ी बात भारतीय सैनिकों को बर्फीले युद्धों का कहीं से कोई प्रशिक्षण प्राप्त नही था । हरियाणा , राजस्थान और पंजाब के गर्म इलाको के रहनें वाले सैनिकों को अचानक आदेश प्राप्त हुए अरुणाचल प्रदेश पहुँचने के ! लद्दाख पहुँचने के ! वो जांबाज़ थे ! हँसते गाते , जान हथेली पर लिए चीनियों से लड़ने पहुँच गए वो जवान किंतु सिवाय हौसलों के उनके पास कुछ नही था ! साधारण सी जर्सी ! साधारण जूते ! पुराने हथियार ! और समक्ष थी आधुनिक चीनी सैना ! तैयार ! तत्पर ! और उससे भी घातक प्रतिद्वंदी था
मौसम ! ऐसा भयावह ठंडा मौसम जिससे गर्म मैदानों में रहनें वाले उन सैनिकों का कभी वास्ता पड़ा ही नही था ! पैरों के नीचे मोटी मोटी बर्फ की चादरें ! बर्फ की नुकीली बौछारें ! हाड़-मांस को जमा देनें वाला बर्फीला तापमान ! 16,000 से 18,000 तक की अत्यधिक ऊँचाई ! आक्सीजन की कमी ! खराब संचार व्यवस्था ! पुराने वाहन ! पुरानी बंदूके ! पीछे से आनें वाली रसद- पानी का अकाल ! और कई परिस्थितियों में पोस्ट को छोड़कर पीछे हट जानें का आदेश भी अर्थात बिना लड़े ही समर्पण और वो भी केवल इसलिए कि सेना को न संसाधन दिए गए और न ही पर्वतीय क्षेत्रों में लड़ने की कोई ट्रेनिंग ! लेकिन उन सिपाहियों के हौसलों की गर्मी ने तमाम मुश्किल हालातों को न केवल शिकस्त ही दी बल्कि बहादुरी का एक ऐसा इतिहास लिखा जिसकी दूसरी मिसाल समूचे विश्व में नही मिलती ! बर्फीले तूफानों और ऊँचाइयों के कारण अक्सर संपर्क टूट जाते थे तो ऐसी स्थिति में लद्दाख की अग्रिम चौकियों में तैनात सैन्य टुकड़ियों के अफसरो नें खुद फैसले लिए ! मुश्किल फैसले लिए और वो फैसले पीछे हटने के नही थे ! वो अदम्य फैसले डटे रहनें के थे ! जान जाए तो जाए किंतु दुश्मन के हाथ भारत की भूमि न जाए ! भारतीय सेना लगातार नुकसान उठा रही थी , इसलिए नही कि वो धीर -वीर नही थी बल्कि इसलिए कि उसको साज़ो सामान के साथ , प्रशिक्षण के साथ , सम्मान के साथ और विश्वास के खड़ा नही किया गया था किंतु ये तमाम विपरीत परिस्थितियाँ भी भारतीय सैनिकों की मूल वीरता को नही छीन पाईं ! लद्दाख के उस ठंडे कब्रिस्तान में भारत के वीर अपनें हाथों से , अपनें पाँवो से , अपनी आँखो से , अपने कानों से , अपनी कमर और पेट के बल से , अपनें शरीर के अंग अंग से लड़ रहे थे , शौर्य की कहानियाँ गढ़ रहे थे और माँ भारती पर अपनी जान निसार कर रहे थे ! शहीदों के शव तिरंगे में लिपट लिपट कर उनके घरों में आ रहे थे ! माँ भारती अपनें लालों को खो रही थी ! कुछ गलत नीतियाँ , कुछ गलत फैसले , कुछ गलत नेता और नुकसान बेइंतिहा !
लद्दाख से मीलों दूर मिथिलांचल के दरभंगा शहर के एक छोटे से गांव पिपरा में एक फौजी गाड़ी अत्यंत धीमी गति से पहुँचती है , साथ में गाँव वालों का हुजूम ! “जय हिंद ” के नारे से सारा वातावरण गुंजायमान ! कुछ गाँव का कच्चा रास्ता ! कुछ फौजी वाहन द्वारा उड़ाई गई धूल ! कुछ गाँववालों के समवेत पदचाप ! कुछ गोधूलि की बेला ! धूल ही धूल !” जय हिंद ” के नारों की गूँज ! “सूरज सिंह अमर रहे! अमर रहे ! “की गूँज! विलाप के स्वर भी थे ! धूल में घुली बेहिसाब आँसुओं की नमी भी थी ! फौजी गाड़ी रुकी और वो मोहन किसान के छोटे से झोपड़ेनुमा घर के आगे रुकी ! तिरंगे मे लिपटा हुआ मोहन सिंह के बेटे शहीद सूरज सिंह का शव सम्मान के साथ दो – तीन फौजियों ने उतारा और घरवालों को सौंपा ! समूचा वातावरण द्रवित हो उठा ! तिरंगे में लिपटा सूरज सिंह का पार्थिव शरीर भूमि पर गरिमा के साथ लिटा दिया गया ! सारा घर-कुनबा आस पास ! माँ अपना होश खो बैठी ! बहनों की सिसकियाँ साँसों के भीतर घुटी – घुटी सी ! और पत्नी अपने छोटे बच्चे को आँचल में समेटे हुए , हिचकियों के साथ रोते हुए !
एक-एक हिचकी के साथ मानो दम घुटता हुआ सा ! घर का लाल शहीद हो गया और उसके साथ जाने कितने सपनें , कितनी उम्मीदें , कितनी मुस्कानें शहीद हो गईं ! किसनें जानी ! किसनें देखी ! शाम ढल गई ! उस दिन उस गाँव मे दो सूरज ढले ! एक आसमानों का सूरज ! दूसरे एक छोटा से गाँव के घर का सूरज ! आसमानों के सूरज को दूसरे दिन पुनः निकलना था किंतु मोहन सिंह के घर का सूरज अब नही निकलने वाला था । सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार होना संभव नही था । शहीद का पार्थिव शरीर आसपास के जनमानस के दर्शनार्थ रख दिया गया । साथ में एक दीपक जलाया गया ! विधि की कैसी भयावह विडंबना ! जिस घर द्वारे में अलमस्त बना घूमता था सूरज , आज वही निष्प्राण शयन कर रहा था ! जिसकी उपस्थिति से घर लहक-महक से भर जाता था – उसमें उस दिन कोई स्पंदन नही ! तिरंगे की शान बना , तिरंगे में लिपटा – जैसा फौजियों ने लिटाया , घरवालो नें भी उस शहीद को उसी स्थिति में रहनें दिया ! फौजी भी वहीं गाँव मे रुक गए! शाम रात में और रात और अधिक गहन रात में ढलती चली गई ! वो रात आँसुओं की रात थी !
किंतु वो समन्वय की भी रात थी ! मिथिलांचल अपने पदचिन्ह लद्दाख के उत्तुंग पहाड़ों की बर्फीली चोटियों पर छोड़ आया था ! लद्दाख का कुछ अंश तिरंगे में लिपटकर मिथिलांचल आ गया था ! शहीद के शव को तिरंगे में लपेटकर लाने वाले फौजियों में से एक पंजाब से , एक तमिलनाडु से और एक सुदूर पूर्व अरुणाचल प्रदेश से था ! ये तीनों फौजी उस रात गाँव में ही रुके ! भारत की चारों दिशाएँ मानों उस शहीद के शव में आकर घनीभूत हो गईं हों ! शहादत नें तिलिस्म गढ़ दिया था ! धरा और आकाश दोनों विस्मित ! रात लम्हा लम्हा बीत रही थी ! सिसकियाँ डूब रहीं थीं ! नींद किसी की आँखों में न थी ! जो अगली सुबह होनी थी वो कितनें ही संघर्षों और दुखों के बवंडरों को साथ लाने वाली थी ! इसका आभास सभी को था किंतु जो होनी थी वो होकर रही और होनी के सामनें किसकी चली ! अगले दिन सुबह ग्यारह बजे तक दाह संस्कार होना था । घर के पुश्तैनी पंडितजी को संदेश दे दिया गया था ।
गाँव वालों द्वारा शहीद के अंतिम दर्शन के पश्चात अंतिम क्रिया होनी थी ! शरीर को अंततः पंचतत्व में विलीन होना ही था !
रात बीत गई! भोर की प्रथम किरणें नभ से प्रस्फुटित होनें को आकुल हो रहीं थी कि घर में कुछ हलचल हुई ! दरभंगा की महारानी शहीद के अंतिम दर्शन हेतु पधारीं थी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ ! सभी घरवाले भौंचक्के ! सब हाथ जोड़कर खड़े हो गए! जिस महारानी के दूर से दर्शन होते थे , आज वो उनके घर विराजी थीं ! महारानी सीधे धरा पर लेटे शहीद के शव के पास पाँवो की ओर गईं और हाथ जोड़कर नीचे झुक गईं । फिर उन्होनें थोड़ी सी चादर उठाई और शहीद के पाँव छुए । जैसे ही महारानी ने शहीद के पाँव छुए वो चीख पड़ी ! सब हैरान ! एक फौजी भागा-भागा महारानी के पास आया और बोला , ” क्या हुआ ! ” महारानी रूँघे गले से बोलीं ,” इनके पाँव इतनें गले हुए क्यों हैं ? ऐसे गले , ऐसे गले जैसे कोई आलू गल गया हो ! ऐसा क्यों है ? ”
तीनों फौजी ऐसे चुप मानों उन्हे लकवा मार गया हो ! घरवाले सकते में ! फिर एक फौजी धीरे से बोला , ” महारानी जी ! इस शहीद ने लद्दाख में बर्फ में लड़ाई लड़ी है -20 से -30 तापमान के बीच ! इसके पास मामूली जूते थे , चीनियों की तरह बर्फ में लड़ने वाले गर्म जूते नही ! लद्दाख मे हमारी फौज के पास कुछ भी गर्म नही था ! न जूते ! न स्वेटर ! न दस्ताने ! न जुराब! सिर्फ उनका खून ही गर्म था ! उनके पाँव बर्फ में लड़ते-लड़ते गल गए पर वो तब तक लड़े जब तक खून शरीर मे बहता रहा ! इस फौजी ने भी ऐसी ही लड़ाई लड़ी ! ” कहते कहते उस फौजी का गला रूँघ गया । पास खड़े सभी जनों की आँखों से झरझर आँसू बह रहे थे ! एक ही विचार सभी के दिलों में कौंध रहा था , “कितनी ठंडी , कितनी निष्ठुर वो बर्फ रही होगी ! कितनी मुश्किल इस शहीद के लिए वो जंग रही होगी जिसके पास न गर्म ड्रैस थी , न गर्म जूते , न गर्म जुराब – कुछ भी नही था ! पाँवो में नश्तर बनकर कैसे वो बर्फ चुभी होगी इसके पाँवों में! कैसे सहा होगा इस शहीद ने ? ”
महारानी ने अपनें आँसू पोंछे और पास में बैठी शहीद की पत्नी को गले लगाया , अपनें गले में पहना हुआ बहुमूल्य मुक्ताहार उसकी झोली में डाल दिया , सबके सामनें हाथ जोड़े और शहीद के पिता से बोली, ” इस मुसीबत की घड़ी में हम तुम्हारे साथ हैं ! हम आपके बेटे को तो वापिस नही ला सकते किंतु आपको कोई कमी नही होनें देंगे हम ! ”
और दुख से व्याकुल महारानी अपने महल लौट आईं । महल आकर महारानी जी ने किसी से कोई बात नही की । उन्होने खामोशी से खुद को एक कमरे में बंद कर लिया । अपनें शयन कक्ष में रखे भव्य गोल टेबल पर उन्होंने भारत का नक्शा बिछा दिया और खड़ी होकर उस पर पूरी तरह से झुक गईं । वो अपने सीधे हाथ की उँगलियाँ भारत के नक्शे में छपे लद्दाख क्षेत्र पर फेरनें लगीं और महसूस करनें लगीं वहाँ की बर्फ को ! वहाँ की हाड़ कंपकंपा देनें वाली भयावह ठंड को ! वहाँ मामूली कपड़ों में रेंगते , लड़ते भारतीय सैनिकों की बेबसी को ! उनकी आँखों से बहते टप् टप् आँसुओं नें भारत के नक्शे को भिगो दिया ! अचानक उन्हें अपनी उँगलियों की मँहगी हीरे जवाहरात की अँगूठियाँ निरर्थक जान पड़ीं !
जब राष्ट्र के प्रहरियों के पाँव गर्म जूते न होने के कारण गल गए हों तो ऐसी स्थिति में हीरे जवाहरातों से सुसज्जित तन का क्या औचित्य ! सब व्यर्थ! सदियों से भारत लुटता आया ! भारत की नारियाँ लुटती आईं ! ये स्वर्णाभूषण ! ये श्रृंगार ! ये बहुमूल्य वस्त्र! सब कितनें निरर्थक यदि देश की सीमाएँ ही सुरक्षित न हों ! यदि शत्रु दल बल के साथ भारत में घुस जाता तो क्या बिसात रह जाती तन पर सुसज्जित आभूषणों की ! तन की ही कुछ बिसात न रहती ! राष्ट्र की सीमाएँ सुरक्षित तो सब सुरक्षित! अतः सीमाओं को सुरक्षित करनें वाले प्रहरी सर्वोपरि ! महारानी कामसुंदरी को यकायक अपनी सारी संपदा व्यर्थ लगी ! और फिर महारानी नें एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होने चीन के साथ चल रहे युद्ध में सैनिकों की सहायता हेतु 1962 में अपना 600 मन सोना और कई बीघा जमीन भारत सरकार के नाम दान कर दी। यह केवल आर्थिक सहायता नही थी , यह एक अत्यंत मुश्किल घड़ी में राष्ट्र को नैतिक संबल भी था !
इस दान के साथ उन्होने एक पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखा और उसमें एक पंक्ति विशेष रूप से लिखी , ‘ध्यान रखिएगा कि कोई शहीद गले पाँवो के साथ घर न लौटे ! ”
द्वारा डा. प्रीता पँवार
भूतपूर्व प्राचार्या ,
231 , सैक्टर 21 बी , फरीदाबाद
हरियाणा – 121001
मो . 9540044105









